कविता

 


                    ज्योतिर्लिंग       


          सुशीला रोहिला , सोनीपत हरियाणा 


          शिव भोले भंड़ारी , हाथ त्रिशुल
          कंमडल ,डमरू में अनहद की धुन प्यारी           
          मस्तक पर चंदा साजे, जटा गंगा विराजे 
          तन पर मृगछाला ओढे भभूती का लेप
          गले में सर्प लटके,पत्नी के सिरमुड़ो की माला
            
         शिव रात्रि का भेद जो बताता 
         साधु -सन्त गुरुजन वो कहलाता
         सद्गुरु से शिव रूपी (आत्मा) का 
        ज्ञान पाया वही मन रूपी शव 
         शिव रात्रि का व्रत कहलाया 


         हाथ का त्रिशुल करता है इशारा
         मन को करो सब तीन गुणों से प्याला
         कमंड़ल का संदेश चित्त में भरो गुरुपदेश
         चाँद की चाँदनी का है उपदेश
         मन में सद्भावना का हो प्रकाश 
         
 
         माता गंगा की है सीख ,वेग अभिमान 
         का ना बढ़ने पाए, वर्ण- भेद मिट जाए नाम
         ऊँच-नीच जाति-पाति ,धर्म से मानव 
         ऊपर उठ जाए , अध्यात्म की शक्ति से
         एक राष्ट्र ,एक ध्वज, एक आत्मा हो जाए 


          
         नकारात्मक सर्पो का करो दमन
         सकारात्मक का कंठ में खिलाओ चमन
         अमृत विधि का शिव ने जाना ज्ञान 
         शिव अमरता की बन गया पहचान 
         अमृत का है तालु में ही  स्थान


         शिव का कहना मिलजुल सब रहना
         सच्चा सुख सद्गुरु चरणों में बसता
         वचनों में  बहे ज्ञान की धार  
         उनका है कहना , शव से शिव बन जाना
         शांति साम्राज्य हर चित्त लाना


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