आलेख

      प्रेमकाप्रतीकबैसाखीपर्व 


   • सुशीला रोहिला,सोनीपत हरियाणा 


  बैसाखी पर्व का मायना होता है  - सहारा  सकारात्मक ,  सोच  अध्यात्म, बलिदान, त्याग, अमान   अहिंसा आदि  सभी मानवीय मूल्यों का जागरण होना जो इस वर्तमान समय में  हमारे  जीवन की अनिवार्यता है । 


 गुरु नानक देव तथा अन्य  सद्गुरु महाराज ने एक मानवता का पैगाम दिया कि विश्व में शांति का साम्राज्य हो । शांति का साम्राज्य ही विकास का साम्राज्य है जो अध्यात्म की  नींव पर टिका है । अध्यात्म को धारण करना ही धर्म है ।
योग की परिभाषा भी सही मायने में  व्यक्त करे तो  अध्यात्म ही योग है  जो मन का आत्मा से मिलन है, जिस बैसाखी के सान्निध्य में  आने से भय ,शौक , खुशी, गमी ,ऊंच -नीच, रंग-भेद अमीर -गरीब की  भावना से ऊपर उठाकर संपूर्ण  मान समाज को एकाग्र शक्ति प्राप्त होती है ।
 घर ही मानव की बैसाखी  कैसे ?
 जैसे जंगल में  आग लग जाने पर एक चूहा बिल में  ही सुरक्षित  और जीवित रह सकता है । इसी प्रकार  कोरोना   महामारी की आग से अपनी सुरक्षा  घर पर रह कर ही हो सकतीं है । 


   स्वच्छता  से मिलती समृद्धि  और  विकास 
  भौतिकवाद की अग्नि सुलगता में सुलगता मानव आज कोरोना  जैसी महामारी  रूपी  वायरस को उपजा कर विश्व का स्वामित्व पद प्राप्त करना चाहता है ।   लेकिन  यह मानव की भूल है ।क्योंकि विश्व  स्वामित्व का पद मन की स्वच्छता पर निर्भर करता है । जो मानव अपने मन को अध्यात्म के संग  जोड़ कर आत्मिक  शक्ति को भरपूर  प्राप्त करता है  मानव से महामानव बनने की क्षमता  उस में  आती।है तो वह अपने इन्द्रियों को निजीस्वार्थ से ऊपर  उठ कर  मानवता का प्रकाश फैलाने लगता है ।वहीं  मानव विश्व का स्वामी  पद प्राप्त कर भगवान राम,कृष्ण, गुरु नानक, सन्त की श्रेणी में  आता है । फिर वह मानव बाहरी  और आन्तरिक रूप से स्वच्छता को ग्रहण  कर लेता है ।


 बैसाखी पर्व  के संदेश  को जीवन में  चरितार्थ करते हुए  अपने देश की राष्ट्र की और संपूर्ण  जगत की  सुरक्षा का  भावना  का जागरण  करते हुए सद्भावना का प्रकाश फैलाकर मानव  धर्म  को उजागर कर भारतमाता विश्व को की गुरू बनाने में  अपना  तन-मन-धन से सहयोग करते हुए राष्ट्र भक्त, गुरु भक्त, पितृभक्त,मातृभक्त, मानवता के पुजारी बनें ।


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