कविता

           


   नन्हीं जान



  • सुशीला रोहिला, सोनीपत (हरियाणा )


 


नन्हीं सुकोमल कली 


ईश्वरीय रूप की छवि 


तरु की विशालता


ज्यों अंग -अंग भरी


 


 


 शैशस्वकाल मस्तीकाल


 आनंद की गंगा  बहती


मृतक देह में भी प्राण भरती


 मन मोदित सबका करती


 


  सब भेद भाव को भुलाती


 हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई


 इसकी परख उसको न होती


 सबके चित्त को  प्रसन्न करती


 


 


  काश सभी  मानव का मन


  अबोध बालक बन जाए 


 घृणा हर चित्त से हट जाए


  मानव मानवता में बंध जाए


 


  


 बेटी सौभाग्य है बेटी भाग्य है


 मुस्कान से हर तनाव हरती


 झोली खुशियों से भरती 


नन्हीं जान ईश्वरीय पहचान


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